भारत की पांडुलिपि धरोहर पर पहली अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस: संस्कृति मंत्रालय ने किया वैश्विक सम्मेलन का ऐलान

पोस्टर: भारत की पांडुलिपि धरोहर पर आधारित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, 11-13 सितंबर 2025, भारत मंडपम, नई दिल्ली
संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित 'भारत की पांडुलिपि धरोहर' पर पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, 11–13 सितंबर 2025, नई दिल्ली के भारत मंडपम में।
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नई दिल्ली, 11 जुलाई 2025 —भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर भारत और विश्व की प्राचीन पांडुलिपि धरोहर को संरक्षित करने, पुनर्जीवित करने और वैश्विक संवाद के लिए एक ऐतिहासिक पहल की घोषणा की है। ‘पांडुलिपि धरोहर के माध्यम से भारत की ज्ञान परंपरा की पुनर्प्राप्ति’ विषय पर आधारित यह पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 11 से 13 सितंबर 2025 तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित किया जाएगा। यह सम्मेलन भारत की उस समृद्ध विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का प्रयास है, जो लाखों पांडुलिपियों के रूप में आज भी जीवित है। साथ ही, यह आयोजन स्वामी विवेकानंद के 11 सितंबर 1893 को दिए गए ऐतिहासिक भाषण की स्मृति में आयोजित किया जा रहा है, जो भारत की शाश्वत ज्ञान परंपरा, वैश्विक शांति और भाईचारे के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

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भारत में दस मिलियन से भी अधिक पांडुलिपियाँ मौजूद हैं, जो दर्शन, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान, साहित्य, संगीत, नाट्य, अनुष्ठान और विभिन्न कला विधाओं से संबंधित हैं। ये पांडुलिपियाँ न केवल ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवंत कड़ियाँ हैं, जो समय की कसौटी पर खरे उतरते हुए आज भी अध्ययन और शोध का आधार बनी हुई हैं। हालांकि यह सम्मेलन भारत के नेतृत्व में आयोजित हो रहा है, लेकिन इसका दृष्टिकोण पूरी तरह वैश्विक है। इसमें न केवल भारतीय विद्वान और शोधकर्ता शामिल होंगे, बल्कि विश्वभर से प्रतिष्ठित संस्कृति संरक्षक, शिक्षाविद्, अभिलेख विशेषज्ञ और तकनीकी नवप्रवर्तक भी भाग लेंगे, जो अपने-अपने देशों की पांडुलिपि परंपराओं और संरक्षात्मक अनुभवों को साझा करेंगे।

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यह तीन दिवसीय सम्मेलन हाइब्रिड स्वरूप में आयोजित किया जाएगा, ताकि भौगोलिक सीमाओं के बावजूद अधिक से अधिक सहभागिता सुनिश्चित की जा सके। आयोजन में लगभग 500 प्रतिनिधियों के भाग लेने की संभावना है, जिनमें 75 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रमुख विद्वान और विशेषज्ञ शामिल होंगे। सम्मेलन में विभिन्न सत्रों के माध्यम से पांडुलिपि संरक्षण, डिजिटलीकरण, मेटाडाटा मानकीकरण, लिपि विश्लेषण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित संग्रहण प्रणाली, नैतिक अभिरक्षा, पाठ्यक्रमों में समावेशन और वैश्विक सहयोग जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

सम्मेलन के दौरान कई पूरक गतिविधियाँ भी आयोजित की जाएँगी, जो प्रतिभागियों के लिए ज्ञानवर्धक अनुभव बनेंगी। इनमें दुर्लभ और ऐतिहासिक पांडुलिपियों की प्रदर्शनी, संरक्षण तकनीकों का लाइव प्रदर्शन, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, कार्यशालाएँ और स्टार्टअप्स की प्रदर्शनी शामिल हैं, जो पांडुलिपि अध्ययन और आधुनिक तकनीक के समन्वय पर केंद्रित होंगी। यह पहल न केवल पुरातन ज्ञान को संजोने की दिशा में है, बल्कि उसे नई पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बनाने की भी कोशिश है।

सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य ‘नई दिल्ली घोषणा पत्र’ को पारित करना है, जो पांडुलिपि संरक्षण, अनुवाद, डिजिटलीकरण और शैक्षणिक समावेशन के लिए एक वैश्विक कार्ययोजना तैयार करेगा। इसके तहत विभिन्न देशों और संस्थाओं के साथ दीर्घकालिक साझेदारी विकसित की जाएगी, और एक अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह का गठन किया जाएगा जो संयुक्त प्रयासों से शोध, संरक्षण और ज्ञान-विस्तार को आगे बढ़ाएगा।

युवा शोधकर्ताओं और छात्रों को इस अभियान से जोड़ने के लिए ‘मैन्युस्क्रिप्ट रिसर्च पार्टनर (MRP)’ कार्यक्रम शुरू किया जाएगा, जिसके अंतर्गत उन्हें स्क्रिप्ट लैब, प्रशिक्षण कार्यशालाओं और डिजिटल सामग्री निर्माण का अवसर मिलेगा। इस पहल का उद्देश्य युवाओं को पांडुलिपि अध्ययन के प्रति आकर्षित करना और उन्हें व्यावहारिक अनुभव देना है ताकि एक नई पीढ़ी इस ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ा सके।

सम्मेलन के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में शोध पत्र और केस स्टडी आमंत्रित किए गए हैं। इच्छुक प्रतिभागी संरक्षण तकनीक, संहिता विज्ञान, कानूनी पहलुओं, शिक्षा में उपयोग, सांस्कृतिक कूटनीति और तकनीकी नवाचार जैसे विषयों पर आधारित सारांश 10 अगस्त 2025 तक आधिकारिक वेबसाइट https://gbm-moc.in पर भेज सकते हैं। विस्तृत पत्र या अन्य प्रश्नों के लिए सम्मेलन का ईमेल पता है: gbmconference@gmail.com

यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारत की पांडुलिपि धरोहर को वैश्विक स्तर पर पुनर्स्थापित करने का एक ऐतिहासिक अवसर है। यह न केवल ज्ञान के भंडार को संजोने का माध्यम बनेगा, बल्कि विश्व की विविध सभ्यताओं की साझा विरासत को जोड़ने और संवाद स्थापित करने का भी एक महत्वपूर्ण मंच होगा। भारत, जो एक समय में ‘विश्वगुरु’ के रूप में जाना जाता था, अब पुनः अपने उसी बौद्धिक नेतृत्व की दिशा में कदम बढ़ा रहा है—इस बार पांडुलिपियों के माध्यम से, तकनीक के सहारे, और वैश्विक सहभागिता के साथ।

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