
यरूशलम, 25 फरवरी 2026। इज़राइल की संसद Knesset (कनेसट) में आज भारत की आवाज मजबूती से गूंजी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक संबोधन दिया। यह पहला अवसर है जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने कनेसट के सदन को संबोधित किया। पूरे सदन में उत्साह का माहौल था और प्रधानमंत्री के भाषण का स्वागत तालियों की गड़गड़ाहट से किया गया।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में भारत और इज़राइल को दो जीवंत और मजबूत लोकतंत्र बताते हुए कहा कि दोनों देशों के संबंध साझा मूल्यों, विश्वास और नवाचार पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि वे 140 करोड़ भारतीयों की ओर से मित्रता, सहयोग और साझेदारी का संदेश लेकर आए हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत ने 1950 में इज़राइल को मान्यता दी थी और तब से दोनों देशों के संबंध निरंतर प्रगाढ़ होते गए हैं।

अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के मुद्दे पर स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी परिस्थिति में निर्दोष नागरिकों की हत्या को उचित नहीं ठहराया जा सकता। इज़राइल में हुए आतंकी हमलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की और भारत में हुए 26/11 मुंबई हमलों को याद किया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत और इज़राइल का अनुभव साझा है और इस चुनौती से निपटने के लिए दोनों देश एकजुट हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने मध्य पूर्व क्षेत्र में शांति और स्थिरता की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि स्थायी शांति केवल संवाद, सहयोग और परस्पर सम्मान के माध्यम से ही संभव है। भारत हमेशा क्षेत्रीय संतुलन और मानवीय मूल्यों का समर्थन करता रहा है और आगे भी शांति के प्रयासों में रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा।
उन्होंने रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में बढ़ते सहयोग का उल्लेख किया। इज़राइल को नवाचार का प्रमुख केंद्र बताते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों के युवा और वैज्ञानिक मिलकर नई तकनीकों और विकास के मॉडल तैयार कर सकते हैं। व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भी तेजी से प्रगति हो रही है, जिससे आर्थिक साझेदारी को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
कनेसट में प्रधानमंत्री मोदी को विशेष सम्मान भी प्रदान किया गया, जो दोनों देशों के बीच गहरे विश्वास और रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक माना जा रहा है। यह दौरा और संबोधन भारत-इज़राइल संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री का यह ऐतिहासिक भाषण न केवल कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका और मजबूत नेतृत्व का भी संकेत देता है। इज़राइल की संसद में भारत का संदेश दोनों देशों के भविष्य के सहयोग, शांति और प्रगति की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।
