भारत में मानसून: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने हाल ही में एक अहम पूर्वानुमान जारी करते हुए कहा है कि जुलाई माह में देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना है। हालांकि यह बारिश समान रूप से सभी राज्यों में नहीं होगी। पूर्वोत्तर भारत, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल समेत दक्षिण के कुछ राज्यों तथा उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने का अंदेशा जताया गया है। मौसम विभाग के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र ने एक आधिकारिक प्रेस वार्ता में बताया, “देश के ज्यादातर हिस्सों में औसत या औसत से अधिक वर्षा संभावित है, लेकिन कुछ इलाकों में कमी भी देखने को मिल सकती है।”
इस वर्ष भारत में मानसून ने तय समय से लगभग नौ दिन पहले ही पूरे देश को ढक लिया। 29 जून तक ही यह केरल से लेकर जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर तक फैल गया। आमतौर पर यह प्रक्रिया जुलाई के दूसरे सप्ताह तक पूरी होती है। शुरुआती बारिश से खेती-किसानी को फायदा भी हुआ है। जून माह में ही करीब 26.2 लाख हेक्टेयर भूमि पर बुवाई पूरी हो चुकी थी, जो पिछले वर्ष की तुलना में 11% ज्यादा है। खासकर धान और तिलहन की फसल में इस समय तेजी से बुवाई की जा रही है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और पूर्वी राज्यों में यह मानसून काफी मददगार साबित हो रहा है।
लेकिन भारत में मानसून की यह तेजी पहाड़ी राज्यों के लिए संकट भी बन गई है। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में पिछले 24 घंटों में 223 मिलीमीटर से अधिक बारिश दर्ज की गई, जिससे कई जगहों पर बादल फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं हुई हैं। प्रशासन ने रेड अलर्ट जारी किया है। मंडी के उपायुक्त अरिंदम चौधरी ने बताया, “अब तक चार शव बरामद किए जा चुके हैं और 16 लोग लापता हैं। खराब मौसम के बावजूद राहत-बचाव अभियान तेज किया गया है।” कई पुल बह गए हैं और सैकड़ों लोग प्रभावित इलाकों में फंसे हुए हैं।
उत्तराखंड में भी ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है। संवेदनशील क्षेत्रों में स्कूल बंद कर दिए गए हैं और प्रशासन ने नदियों के किनारे बसे गांवों में चौकसी बढ़ा दी है। कुछ जगहों पर सड़कें टूटने और जलभराव की भी खबरें हैं। दूसरी ओर, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अगले कुछ हफ्तों में औसत से अधिक बारिश की संभावना बताई गई है। इससे वहां शहरी बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का कृषि पर सीधा असर पड़ता है। देश की करीब 70% खेती बारिश पर निर्भर है। हालांकि इस बार शुरुआती मानसून ने उम्मीद जगाई है कि खरीफ फसलों की पैदावार अच्छी रहेगी, लेकिन बारिश का असमान वितरण कई इलाकों में सूखे की चुनौती भी पैदा कर सकता है।
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मौसम वैज्ञानिक मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का व्यवहार और भी अस्थिर होता जा रहा है। कभी भारी बारिश तो कभी लंबे सूखे का दौर किसानों और प्रशासन दोनों के लिए मुश्किल खड़ा कर रहा है। आने वाले हफ्तों में जरूरत होगी कि रियल टाइम मॉनिटरिंग, जल प्रबंधन और आपदा राहत कार्य पहले से बेहतर तरीके से किए जाएं।
अब जुलाई में मानसून की रफ्तार तेज रहने की उम्मीद है। जहां एक तरफ यह समय पर बुवाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है, वहीं भूस्खलन, शहरी बाढ़ और जलभराव से निपटना बड़ी चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्यों ने तैयारियों में कोई ढिलाई बरती, तो बारिश का यह वरदान कुछ जगहों पर आफत भी बन सकता है। ऐसे में सतर्कता और त्वरित प्रतिक्रिया ही आने वाले समय में नुकसान कम कर सकेगी।
